सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते में पैक्ड फूड पर कानून बनाने के आदेश दिए डॉ अर्चिता महाजन* 

*सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते में पैक्ड फूड पर कानून बनाने के आदेश दिए डॉ अर्चिता महाजन* 

 *खाने पीने के छोटे-मोटे मसलों पर भी यदि सुप्रीम कोर्ट की डांट पड़े तो यह प्रशासन की कमजोरी समझी जानी चाहिए* 

 

 

 

डॉ अर्चिता महाजन न्यूट्रीशन डाइटिशियन एवं चाइल्ड केयर मास्टर्स डिग्री इन फूड न्यूट्रिशन एंड डाइटिशियन होम्योपैथिक फार्मासिस्ट एवं ट्रेंड योगा टीचर नॉमिनेटेड फॉर पद्म भूषण राष्ट्रीय पुरस्कार और पंजाब सरकार द्वारा सम्मानित और हिमाचल सरकार द्वारा सम्मानित और लेफ्टिनेंट गवर्नर लद्दाख श्री कविंदर गुप्ता जी द्वारा सम्मानित ने बताया कि लंबे समय से मैं लिख रही हूं कि पैक्ड फूड के बारे में देश में कोई कानून पालन करता ही नहीं है। पहले से बने कानून में इतने शाहिद हैं कि उनको बाईपास करना बहुत आसान है। और कुछ ढिलाई एजेंटीयों द्वारा भी बरती जा रही है। जिसके कारण देश की युवा पीढ़ी बीमारियों का शिकार हो रही है।सुप्रीम कोर्ट ने पैकेटबंद (पैकेज्ड) फूड के पैकेट के सामने वाले हिस्से पर चीनी, नमक और फैट की अधिक मात्रा की स्पष्ट चेतावनी (फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल) लगाने में हो रही देरी पर केंद्र सरकार और FSSAI को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि जनहित और बच्चों की सेहत से जुड़े इस मामले में यदि दो सप्ताह में अंतिम निर्णय नहीं लिया गया, तो अदालत खुद निर्देश जारी करेगी।अदालत की मुख्य बातें और निर्देशजन स्वास्थ्य सर्वोपरि: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पैक्ड फूड निर्माताओं के व्यावसायिक और कारोबारी हित नागरिकों के स्वास्थ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं।दलीलें खारिज: अदालत ने केंद्र सरकार और उद्योग जगत के इस तर्क को खारिज कर दिया कि पारंपरिक भारतीय खान-पान या स्नैक्स में नमक-फैट ज्यादा होता है इसलिए चेतावनी जरूरी नहीं है।खरीदने का अधिकार: कोर्ट ने कहा कि चेतावनी छपने से लोग क्या खरीदें और क्या नहीं, इसका फैसला खुद उपभोक्ता करेंगे, लेकिन उन्हें सही जानकारी मिलना उनका अधिकार है।दो हफ्ते की मोहलत: अदालत ने सरकार और खाद्य नियामक को अपना अंतिम फैसला रिकॉर्ड पर रखने के लिए केवल दो सप्ताह का आखिरी मौका दिया है।

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